मंगलवार, 15 अप्रैल 2025

शिवलिंग के ऊपर बांधी जाने वाली मटकी को क्या कहते हैं, इसे कब और क्यों बांधते हैं..? vedicsanskrti

शिवलिंग के ऊपर बांधी जाने वाली मटकी को क्या कहते हैं, इसे कब और क्यों बांधते हैं..?
 




 शिवलिंग के ऊपर बांधी जाने वाली मटकी को क्या कहते हैं, इसे कब और क्यों बांधते हैं..?
 

हम कई बार शिवलिंग के ऊपर एक मटकी बंधी हुई देखते हैं, या स्टेंड पर रखी हुई होती है.. जिसमें से बूंद-बूंद पानी शिवलिंग पर गिरता रहता है। ये दृश्य अक्सर गर्मी के दिनों में देखने को मिलता है। इस परंपरा से जुड़ी कई बातें हैं, जिसके बारे में  जानना बहुत आवश्यक है।

इन दिनों वैशाख मास चल रहा है, जो 12 मई तक रहेगा। इस महीने में शिवलिंग के ऊपर एक पानी से भरी मटकी बांधने की परंपरा है। इस मटकी से बूंद-बूंद पानी शिवलिंग पर गिरता रहता है। वैशाख मास में ही ऐसा क्यों किया जाता है और इस परंपरा का क्या महत्व है। इससे जुड़ी कई कथाएं और मान्यताएं हमारे समाज में प्रचलित हैं। आज हम आपको इसी परंपरा से जुड़ी मुख्य बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार है…

क्या कहते हैं इस मटकी को...?

शिवलिंग को ऊपर जो पानी से भरी मटकी बांधी जाती है, उसे गलंतिका कहा जाता है। गलंतिका का शाब्दिक अर्थ है जल पिलाने का करवा या बर्तन। इस मटकी में नीचे की ओर एक छोटा सा छेद होता है जिसमें से एक-एक बूंद पानी शिवलिंग पर निरंतर गिरता रहता है। ये मटकी मिट्टी या किसी अन्य धातु की भी हो सकती है। इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि इस मटकी का पानी खत्म न हो।

 क्या है इस परंपरा से जुड़ी कथा...?

धर्म ग्रंथों के अनुसार समुद्र मंथन करने पर सबसे पहले कालकूट नाम का भयंकर विष निकला, जिससे संसार में त्राहि-त्राहि मच गई। तब शिवजी ने उस विष को अपने गले में धारण कर लिया। मान्यताओं के अनुसार, वैशाख मास में जब अत्यधिक गर्मी पड़ने लगती है जो कालकूट विष के कारण शिवजी के शरीर का तापमान में बढ़ने लगता है। उस तापमान को नियंत्रित रखने के लिए ही शिवलिंग पर गलंतिका बांधी जाती है। जिसमें से बूंद-बूंद टपकता जल शिवजी को ठंडक प्रदान करता है।

 इसी से शुरू हुई शिवजी को जल चढ़ाने की परंपरा..?

शिवलिंग पर प्रतिदिन लोगों द्वारा जल चढ़ाया जाता है। इसके पीछे ही यही कारण है कि शिवजी के शरीरा का तापमान सामान्य रहे। गर्मी के दिनों तापमान अधिक रहता है इसलिए इस समय गलंतिका बांधी जाती है ताकि निरंतर रूप से शिवलिंग पर जल की धारा गिरती रहे।

इस बात का रखें खास ध्यान -

वैसाख मास में लगभग हर मंदिर में शिवलिंग के ऊपर गलंतिका बांधी जाती है। इस परंपरा में ये बात ध्यान रखने वाली है तो गलंतिका में डाला जाने वाला जल पूरी तरह से शुद्ध हो। चूंकि ये जल शिवलिंग पर गिरता है इसलिए इसका शुद्ध होना जरूरी है। अगर किसी अपवित्र स्रोत से लिया गया जल गलंतिका में डालने से भविष्य में परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

अत : सफाई और शुद्धता का ध्यान रखना जरूरी है।
मृत्तिका की मटकी उत्तम होती है क्योंकि ग्रीष्म ऋतु में इससे जल ठंडा हो जाता है जिससे महादेव जी प्रसन्न होते हैं..!!

                         !! वैदिक संस्कृति !!

नोट - जलधारा शिवप्रिया !! 
जल की धारा शिव को विशेष प्रिय है , आप सदा शिव जी पर जलधारा पात्र लगा सकते हैं ।
यह वैशिष्ट्य वैशाख मास हेतु है , अन्य मास या काल में भी आप इसका उपयोग यथाविधि कर सकते हैं ।।

🔱📿 हर हर महादेव 📿🔱

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गुरुवार, 30 जनवरी 2025

बसन्त पंचमी 2025 कब है..?? जानिए इस दिन सरस्वती पूजा कब और कैसे करें सम्पूर्ण जानकारी । वैदिक संस्कृति

बसन्त पंचमी 2025 कब है..??

जानिए इस दिन सरस्वती पूजा कब और कैसे करें सम्पूर्ण जानकारी.. वैदिक संस्कृति Blog पर

बसन्त पंचमी 2025 ।। basant panchmi 2025





 बसंत ऋतु के आगमन का सबसे पवित्र त्यौहार बसन्त पंचमी इस दिन ज्ञान की देवी माता सरस्वती की पूजा की जाती है। इसे हर साल माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। इसी दिन से ही बसंत ऋतु की शुरुआत भी होती है। बसंत पंचमी के इस शुभ अवसर पर पीले वस्त्र धारण कर विद्या की देवी सरस्वती की आराधना का विधान है। ज्ञान, संगीत, कला, विज्ञान और शिल्प-कला की देवी माता सरस्वती के इस पावन दिवस पर आइए जानते हैं, बसन्त पंचमी कब है शुभ मुहूर्त कब है और कब और कैसे माता की आराधना करना चाहिए..


बसन्त पञ्चमी मुहूर्त पर सरस्वती पूजा :-
बसन्त पञ्चमी रविवार, फरवरी 2, 2025 को
बसन्त पञ्चमी सरस्वती पूजा मुहूर्त - 07:09 ए एम से 12:35 पी एम
अवधि - 05 घण्टे 26 मिनट्स
बसन्त पञ्चमी मध्याह्न का क्षण - 12:35 पी एम
बसन्त तिथि प्रारम्भ - फरवरी 02, 2025 को 09:14 ए एम बजे
पञ्चमी तिथि समाप्त - फरवरी 03, 2025 को 06:52 ए एम बजे


ज्योतिष विद्या में पारन्गत व्यक्तियों के अनुसार बसन्त पञ्चमी का दिन सभी शुभ कार्यो के लिये उपयुक्त माना जाता है। इसी कारण से बसन्त पञ्चमी का दिन अबूझ मुहूर्त के नाम से प्रसिद्ध है और नवीन कार्यों की शुरुआत के लिये उत्तम माना जाता है।

बसन्त पञ्चमी के दिन किसी भी समय सरस्वती पूजा की जा सकती है परन्तु पूर्वाह्न का समय पूजा के लिये श्रेष्ठ माना जाता है। सभी विद्यालयों और शिक्षा केन्द्रों में पूर्वाह्न के समय ही सरस्वती पूजा कर माता सरस्वती का आशीर्वाद ग्रहण किया जाता है।

वैदिक पञ्चाङ्ग में सरस्वती पूजा का जो मुहूर्त दिया गया है उस समय पञ्चमी तिथि और पूर्वाह्न दोनों ही व्याप्त होते हैं। इसीलिये बसन्त पञ्चमी के दिन सरस्वती पूजा इसी समय के दौरान करना श्रेष्ठ है।

बसंत पंचमी का धार्मिक महत्व :-
बसन्त पंचमी को देवी सरस्वती के जन्मोत्सव के रूप में भी मनाया जाता हैं। जैसे दीवाली का दिन देवी लक्ष्मी की पूजा हेतु अत्यन्त महत्वपूर्ण है, जो कि सम्पत्ति एवं समृद्धि की देवी हैं तथा नवरात्री को देवी दुर्गा के पूजन हेतु महत्वपूर्ण माना जाता है, जो कि शक्ति एवं वीरता की देवी हैं, इसी प्रकार वसन्त पञ्चमी पर्व देवी सरस्वती की आराधना हेतु महत्वपूर्ण होता है, जो कि ज्ञान एवं बुद्धिमत्ता की देवी हैं। धर्मग्रंथों के अनुसार, इस दिन ही देवी सरस्वती प्रकट हुई थीं, तब समस्त देवी-देवताओं ने माँ सरस्वती की स्तुति की थी। इस स्तुति से ही वेदों की ऋचाएं बनीं और उनसे वसंत राग का निर्माण हुआ। यही कारण है कि इस दिन को वसंत पंचमी के रूप में मनाया जाता है। 

बसंत ऋतु  छः ऋतुओं में सर्वाधिक लोकप्रिय है और इस ऋतु में प्रकृति का सौंदर्य मन को मोहित करता है। 

बसंत पंचमी पर संपन्न होने वाली पूजा :-
बसंत पंचमी का सनातन धर्म में अत्यधिक महत्व है और इस दिन पीले रंग के उपयोग को शुभ माना जाता है। इस दिन देवी सरस्वती सहित भगवान विष्णु का पूजन किया जाता है। इस दिन देवी सरस्वती की पूजा करना विशेष रूप से फलदायी होता है,

बसन्त पंचमी पर देवी सरस्वती की पूजा इस प्रकार करें:-

पूजा स्थान की साफ़-सफाई करने के बाद गंगा जल का छिड़काव करें। 
इसके पश्चात देवी सरस्वती की प्रतिमा को चौकी पर स्थापित करें। 
अब सर्वप्रथम विघ्नहर्ता गणेश का ध्यान करें और उसके पश्चात कलश की स्थापना करें। 
मां सरस्वती को पीले रंग के वस्त्र अर्पित करें।
इसके बाद देवी को रोली, चंदन, हल्दी, केसर, चंदन, पीले या सफेद रंग के पुष्प और अक्षत अर्पित करें।

देवी सरस्वती का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए सरस्वती स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। 
अब दोनों हाथ जोड़कर माता सरस्वती का ध्यान एवं उनसे प्रार्थना करें। 
अंत में देवी सरस्वती की आरती करें और उन्हें प्रसाद रूप में पीली मिठाई का भोग लगाएं। 

When is Basant Panchami 2025:-
प्रतिवर्ष बसंत पंचमी का पर्व हिंदू कैलेंडर के अनुसार माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है। इस दिन माता सरस्वती का प्राकट्योत्सव मनाते हैं। मां सरस्वती की पूजा के साथ ही कलम दवात की पूजा भी करते हैं। रोमन कैलेंडर के अनुसार इस बार बसंत पंचमी का पर्व 2 जनवरी 2025 रविवार के दिन है। 


इन कामों को करने से मिलेगा ज्ञान का वरदान :-

बसंत पंचमी/Basant Panchami को सबसे शुभ समय में से एक माना गया है, मान्यताओं के अनुसार इस दिन किया जाने वाला कार्य शुभता को प्राप्त होता है। कार्य की सिद्धि हेतु यह दिन अत्यंत उपयोगी बताया गया है। विद्या की देवी सरस्वी के प्राकटय दिवस के रुप में मनाया जाने वाला ये पर्व दर्शाता है कि किसी प्रकार जब ज्ञान का आगमन होता है तो अंधकार स्वत: ही समाप्त हो जाता है। मानव विकास के क्रम में इसी ज्ञान ने ही तो हमें अंधकार से बाहर निकाल कर ब्रह्माण्ड तक पहुंचने में मदद प्राप्त की और भारतीय संस्कृति में तो योगीजनों ने सदैव की इस ज्ञान को संचित करते हुए सभी तक फैलाया है। 

इस शुभ दिवस के दिन यदि कुछ कार्यों को किया जाए तो उनके प्रभाव से इसकी शुभता में असीम वृद्धि देखने को मिलती है क्योंकि यदि ज्ञान का भंडार है तो सभी चीजों को प्राप्त करने में आप सक्षम बन ही जाते हैं तो आईये जानते हैं वो कौन से कार्य हैं जिन्हें इस शुभ दिन पर करने से जीवन को समृद्धिशाली एवं खुशहाल बनाया जा सकता है।  

पीले वस्त्रों का उपयोग :-
बसंत पंचमी के दिन यदि पीले वस्त्रों का उपयोग किया जाए तो यह एक अत्यंत ही शुभदायक होता है। इस दिन पीले वस्त्रों को पहनने से देह एवं मन दोनों को ही शुभता प्राप्त होती है। 


पीले रंग का मिष्ठान :-
बसंत पंचमी के दिन भोग एवं नैवेद्य हेतु पीले रंग से बने मिष्ठानों का उपयोग अत्यंत शुभ होता है। इस दिन केसर-हल्दी का उपयोग करके जो भी मिष्ठान बनाए जाते हैं उनका भगवान को भोग अर्पित करना एवं उस प्रसाद को सभी के साथ ग्रहण करने से आयुष, आरोग्य एवं यश की प्राप्ति होती है।


चंदन एवं पीले-सफेद रंग के पुष्पों का उपयोग :-
बसंत पंचमी के दिन केसर की ही भांति चंदन को भी उपयोग में लाया जाना शुभ होता है पीला चंदन तथा पीले पुष्पों के साथ देवी सरस्‍वती का पूजन करना चाहिए। देवी को केसर, हल्दी एवं चंदन से तिलक करना चाहिए तथा पीले-श्वेत पुष्पों की माला अर्पित करनी चाहिए। 

भगवान गणेश एवं सरस्‍वती वंदना :-
”वर्णानमर्थसंघानां रसानां छन्‍दसामपि
मंगलानां च कर्त्‍तारौ वन्‍दे वाणी विनायकौ

बसंत पंचमी के दिन सर्वप्रथम विध्नहर्ता श्री गणेश को नमन करते हुए गणेश वंदना करनी चाहिए तथा इसके पश्चात मां सरस्वती जी की वंदना अर्चना करनी चाहिए। ” 
 
सरस्वती मंत्र जाप :-
बसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती के
‘ॐ ऐं ह्रीं सरस्वत्यै नम:’ नामक मंत्र का जाप करना चाहिए। 

इसके अतिरिक्त इस शुभ दिन पर पवित्र नदीयों में स्नान करना, विद्या से जुड़ी चीजें, वाद्य यंत्र आदि का पूजन,
सरस्वती एकाक्षरी मंत्र “ऐं” का उच्चारण एवं लिखना चाहिए। 


सरस्वती पूजा का महत्व:-
बसंत पंचमी का पर्व देवी सरस्वती को समर्पित है, जो ज्ञान का प्रकाश फैलाकर अज्ञानता, आलस्य और सुस्ती को दूर करती हैं। इस दिन लोग शिक्षा, कला और बौद्धिक प्रयासों में उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए उनकी कृपा प्राप्त करने की कामना करते हैं। खासतौर पर छात्रों और शिक्षार्थियों के लिए यह दिन अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह नई शैक्षिक शुरुआत का प्रतीक है।

बसंत पंचमी का एक प्रसिद्ध अनुष्ठान अक्षर-अभ्यास या विद्या-आरंभ (जिसे प्रासाना भी कहा जाता है) है, जिसमें बच्चों को शिक्षा की शुरुआत कराई जाती है। इस दिन स्कूलो और कॉलेजो में विशेष पूजा का आयोजन करते हैं, ताकि मां सरस्वती की कृपा से सफलता और ज्ञान प्राप्त हो सके।

कई ज्योतिषी बसंत पंचमी को अबूझ दिन मानते हैं, यानी इस दिन कोई भी नया काम शुरू करना अत्यंत शुभ होता है। यही कारण है कि सरस्वती पूजा का महत्व और भी बढ़ जाता है, जिससे यह पूरा दिन पूजा और शुभ कर्मों के लिए खास हो जाता है।

बसंत पंचमी से जुड़ी परंपराएँ और अनुष्ठान:-
विद्या-अभ्यास: बच्चों को पहली बार लिखाई-पढ़ाई की शुरुआत कराई जाती है। इसे शुभ और ज्ञान की शुरुआत माना जाता है।

पीला रंग:-
पीला रंग बसंत पंचमी का प्रतीक है। लोग पीले वस्त्र पहनते हैं और पीले फूलों से माँ सरस्वती की पूजा करते हैं।

संगीत और नृत्य:-
कई स्कूल, कॉलेज, और सांस्कृतिक संस्थानों में देवी सरस्वती की पूजा के बाद संगीत और नृत्य कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

सरस्वती पूजा के दौरान विशेष भोग:-
बसंत पंचमी के दिन पीले रंग के व्यंजन तैयार किए जाते हैं,
जैसे:
केसरिया चावल
बेसन के लड्डू
हल्दी वाला दूध
मीठा खिचड़ी

बसंत पंचमी का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व:-
बसंत पंचमी केवल धार्मिक पर्व ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकता का उत्सव भी है। यह दिन नई ऊर्जा, सकारात्मकता और उत्साह का प्रतीक है। देवी सरस्वती की आराधना के साथ-साथ यह पर्व प्रकृति के सौंदर्य और परिवर्तन को भी दर्शाता है।
इस बसंत पंचमी, माँ सरस्वती की पूजा कर अपने जीवन को ज्ञान, रचनात्मकता और सकारात्मकता से भरें।

बसंत पंचमी के विशेष पहलू :-
बसंत पंचमी कभी-कभी चतुर्थी तिथि के साथ भी पड़ सकती है, यह पूरी तरह से इस पर निर्भर करता है कि पंचमी तिथि पूर्वाह्न काल में कब शुरू होती है। हालांकि इन बदलावों के बावजूद, इस दिन का महत्व ज्ञान, प्रगति और वसंत की जीवंत ऊर्जा का उत्सव मनाने में हमेशा समान रहता है।

बसंत पंचमी 2025 भक्ति, शिक्षा और नई शुरुआत का दिन है। देवी सरस्वती की कृपा प्राप्त कर भक्त अपने जीवन को ज्ञान और रचनात्मकता से समृद्ध करने का प्रयास करते हैं। चाहे आप एक छात्र हों, एक कलाकार हों, या जीवन में एक नया अध्याय शुरू कर रहे हों, बसंत पंचमी एक ऐसा अवसर है जब आप अपने प्रयासों को दिव्य आशीर्वाद के साथ जोड़कर साल की शुरुआत शुभ तरीके से कर सकते हैं।


वसन्त पञ्चमी पर अनुष्ठान:-
वसन्त पञ्चमी के अवसर पर किये जाने वाले प्रमुख अनुष्ठान एवं गतिविधियाँ निम्नलिखित हैं :-
घर पर सरस्वती पूजा करना
पतंग उड़ाना
श्वेत एवं पीले वस्त्र धारण करना
देवी सरस्वती को सरसों व गेंदे के फूल अर्पित करना
बच्चों का विद्यारम्भ
विद्यालयों व महाविद्यालयों में सरस्वती पूजा का आयोजन करना

नये कार्य आरम्भ करना विशेषतः
शैक्षणिक संस्थानों एवं विधालयों का उद्घाटन आदि करना
अपने दिवङ्गत परिवारजनों के निमित्त पितृ तर्पण करना

बसन्त पञ्चमी की क्षेत्रीय विविधितायें:-
बृज में वसन्त पञ्चमी :-
मथुरा व वृन्दावन के मन्दिरों में वसन्त पञ्चमी समारोह अन्य स्थानों की अपेक्षा अधिक हर्सोल्लास से मनाया जाता है। वसन्त पञ्चमी के दिन बृज के देवालयों में होली उत्सव का आरम्भ होता है। वसन्त पञ्चमी के दिन अधिकांश मन्दिरों को पीले पुष्पों से सुसज्जित किया जाता है। वसन्त आगमन के प्रतीक के रूप में देवी-देवताओं की मूर्तियों को पीले परिधानों से सुशोभित किया जाता है।

इस दिन वृन्दावन में प्रसिद्ध शाह बिहारी मन्दिर में भक्तों के लिये वसन्ती कमरा खोला जाता है। वृन्दावन के श्री बाँके बिहारी मन्दिर में, पुजारी भक्तों पर अबीर व गुलाल डालकर होली उत्सव आरम्भ करते हैं। जो लोग होलिका दहन पण्डाल बनाते हैं, वे इस दिन गड्ढा खोदते हैं तथा उसमें होली डण्डा (एक लकड़ी की छड़ी) स्थापित कर देते हैं। इस लकड़ी पर आगामी 41 दिनों तक अनुपयोगी लकड़ी व सूखे गोबर के कण्डों से ढेर बनाया जाता है जिसे होलिका दहन अनुष्ठान में जलाया जाता है।


पश्चिम बंगाल में वसन्त पञ्चमी :-
पश्चिम बंगाल में वसन्त पञ्चमी को सरस्वती पूजा के रूप में मनाया जाता है। दुर्गा पूजा के सामान ही सरस्वती पूजा पर्व भी अत्यन्त श्रद्धा व भक्ति के साथ मनाया जाता है। सरस्वती पूजा मुख्यतः विद्यार्थियों द्वारा की जाती है। पारम्परिक रूप से इस दिन बालिकायें पीली बसन्ती साड़ी तथा बालक धोती-कुर्ता धारण करते हैं। विद्यार्थियों के साथ-साथ कलाकार भी अध्ययन की पुस्तकें, संगीत वाद्ययन्त्र, पेन्ट-ब्रश, कैनवास, स्याही तथा बाँस की कलम को मूर्ति के सामने रखते हैं तथा देवी सरस्वती के साथ उनकी भी पूजा करते हैं।

दुर्गा पूजा के सामान ही सरस्वती पूजा पर्व भी सामाजिक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग एक साथ अपने क्षेत्रों में पण्डाल बनाते हैं तथा देवी सरस्वती की मूर्ति स्थापित करते हैं। इस दिन परम्परागत रूप से ज्ञान एवं बुद्धिमत्ता की देवी की कृपा प्राप्ति हेतु ग्रामोफोन पर संगीत बजाया जाता है।

नैवेद्य में देवी सरस्वती को बेर, सेब, खजूर तथा केले अर्पित किये जाते हैं तथा तत्पश्चात् भक्तों में वितरित किये जाते हैं। यद्यपि पर्व से काफी पहले ही बेर फल बाजार में उपलब्ध हो जाते हैं, किन्तु अनेक लोग माघ पञ्चमी के दिन देवी सरस्वती को फल अर्पित करने तक इसका सेवन आरम्भ नहीं करते हैं। अधिकांश लोग इस दिन बेर फल का रसास्वादन करने हेतु उत्सुक रहते हैं। सरस्वती पूजा के अवसर पर टोपा कुल चटनी नामक एक विशेष व्यञ्जन के साथ खिचड़ी एवं लबरा का आनन्द लिया जाता है।

सरस्वती पूजा के अतिरिक्त, इस दिन हाते खोरी अनुष्ठान भी किया जाता है जिसके अन्तर्गत बच्चे बंगाली वर्ण-माला सीखना प्रारम्भ करते हैं, इस अनुष्ठान को अन्य राज्यों में विद्यारम्भ के रूप में जाना जाता है।

सन्ध्याकाल में देवी सरस्वती की मूर्ति को घर या पण्डालों से बाहर ले जाया जाता है तथा एक भव्य शोभायात्रा के साथ पवित्र जल स्रोतों में विसर्जित किया जाता है। सामान्यतः मूर्ति विसर्जन तीसरे दिन किया जाता है किन्तु अनेक लोग सरस्वती पूजा के दिन ही विसर्जन करते हैं।

पंजाब एवं हरियाणा :-
पंजाब एवं हरियाणा में वसन्त पञ्चमी का उच्चारण बसन्त पञ्चमी के रूप में किया जाता है। यहाँ बसन्त पञ्चमी के अनुष्ठान किसी पूजा-अर्चना से सम्बन्धित नहीं हैं। यद्यपि यह कारण इस अवसर को कम महत्वपूर्ण नहीं करता है क्योंकि वसन्त ऋतु के आगमन का स्वागत करने हेतु इस दिन विभिन्न आनन्दमयी एवं आकर्षक गतिविधियाँ आयोजित की जाती हैं।

पतंग उड़ाने के लिये यह दिन अत्यधिक लोकप्रिय है। इस आयोजन में पुरुष एवं स्त्रियाँ दोनों की सहभागिता होती है। यह गतिविधि इतनी लोकप्रिय है कि बसन्त पञ्चमी से पूर्व पतंगों की माँग में अप्रत्याशित वृद्धि होती है तथा पर्व के समय पतंग निर्माता अत्यन्त व्यस्त रहते हैं। बसन्त पञ्चमी के दिन, स्पष्ट नीला आकाश विभिन्न प्रकार के रँगों, आकृतियों एवं आकारों वाली अनेक पतंगों से भरा होता है। यह उल्लेखनीय है कि गुजरात एवं आन्ध्र प्रदेश में, मकर संक्रान्ति के समय पतंग उड़ाना अधिक लोकप्रिय है।

इस अवसर पर स्कूल की छात्रायें गिद्दा नामक पारम्परिक पंजाबी परिधान पहनती हैं तथा पतंगबाजी की गतिविधियों में सहभागिता करती हैं। लोग वसन्त के आगमन का स्वागत करने हेतु पीले रँग के परिधानों को प्राथमिकता देते हैं, जिसे लोकप्रिय रूप से बसन्ती रँग के रूप में जाना जाता है। गिद्दा, पंजाब का एक लोक नृत्य है, जो बसन्त पञ्चमी की पूर्व सन्ध्या पर छात्राओं के मध्य अत्यन्त लोकप्रिय होता है।

वसन्त पञ्चमी पर सार्वजनिक जीवन:-
वसन्त पञ्चमी भारत में अनिवार्य राजपत्रित अवकाश नहीं है। यद्यपि सामान्यतः हरियाणा, ओडिशा, त्रिपुरा तथा पश्चिम बंगाल में वसन्त पञ्चमी के दिन एक दिन का अवकाश मनाया जाता है।


सरस्वती वन्दना :-
सरस्वती या कुन्देन्दु देवी सरस्वती को समर्पित बहुत प्रसिद्ध स्तुति है
जो सरस्वती स्तोत्र का एक अंश है। इस सरस्वती स्तुति का पाठ वसन्त पञ्चमी के पावन दिन पर
सरस्वती पूजा के दौरान किया जाता है।

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना॥
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥१॥


शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं।
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्॥
हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्।
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्॥२॥

- वैदिक संस्कृति
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गजानंद महाराज पधारो कीर्तन की तैयारी है लिरिक्स | Gajanand Maharaj Padharo Kirtan Ki Taiyari Hai Lyrics

 

गजानंद महाराज पधारो कीर्तन की तैयारी है लिरिक्स | Gajanand Maharaj Padharo Kirtan Ki Taiyari Hai Lyrics


गणेश जी भजन




गजानंद महाराज पधारो कीर्तन की तैयारी है लिरिक्स


गजानंद महाराज पधारो,
कीर्तन की तैयारी है।


तर्ज – फुल तुम्हे भेजा है खत में..!


– श्लोक –

प्रथम मनाये गणेश को
ध्याऊ शारदा मात ।
मात पिता गुरु प्रभु चरण में ,
नित्य नवाऊँ माथ ।।


गजानंद महाराज पधारो,
कीर्तन की तैयारी है,
आओ आओ बेगा आओ,
चाव दरस को भारी है ॥


थे आवो ज़द काम बणेला,
था पर म्हारी बाजी है,
रणत भंवर गढ़ वाला सुणलो,
चिन्ता म्हाने लागि है,
देर करो मत ना तरसाओ,
चरणा अरज ये म्हारी है,
गजानन्द महाराज पधारो ॥


ऋद्धि सिद्धी संग आओ विनायक,
देवों दरस थारा भगता ने,
भोग लगावा धोक लगावा,
पुष्प चढ़ावा चरणा मे,
गजानंद थारा हाथा मे,
अब तो लाज हमारी है,
गजानन्द महाराज पधारो ॥


भगता की तो विनती सुनली,
शिव सूत प्यारो आयो है,
जय जयकार करो गणपति की,
म्हारो मन हर्षायो है,
बरसेलो अब रस भजना मे,
भक्तों महिमा भारी है,
गजानन्द महाराज पधारो ॥


गजानंद महाराज पधारों,
कीर्तन की तैयारी है,
आओ आओ बेगा आओ,
चाव दरस को भारी है ॥

- वैदिक संस्कृति

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किस वृक्ष की पूजा से मिलता है क्या लाभ..?? @Vedicsanskrti


🌳 जानिए किस वृक्ष की पूजा से मिलता है क्या लाभ..??


किस वृक्ष की पूजा से मिलता है क्या लाभ..??




🌳 किस वृक्ष की पूजा से मिलता है क्या लाभ..??


ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुछ विशेष पेड़-पौधों  की पूजा करने से हमारी कुंडली के दोष तो दूर होते ही हैं साथ ही जीवन की अनेक परेशानियों से छुटकारा भी मिल सकता है।


आइये जानते है किन पेड़-पौधों की पूजा से हमें क्या लाभ हो सकता है।


तुलसी 👉 जिस घर में प्रतिदिन तुलसी के पौधे की पूजा होती है, देवी लक्ष्मी उस घर को छोड़कर कहीं नहीं जाती। वहां सदैव सुख-समृद्धि बनी रहती है।



पीपल 👉 हिन्दू धर्म में पीपल को पूजनीय वृक्ष माना गया है। इसकी पूजा करने से शनि दोष से मुक्ति मिलती है, साथ ही भगवान विष्णु की कृपा भी प्राप्त होती है।



नीम 👉 इसकी पूजा करने से कुंडली के सभी दोष दूर होते हैं व रोगों से छुटकारा भी मिलता है। परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।



बरगद 👉 इसे बड़ व वट वृक्ष भी कहते है। इसकी पूजा से महिलाओं का सौभाग्य अखंड रहता हैं व संतान संबंधी समस्याएं भी दूर होती है। ये बहुत ही पवित्र पेड़ है।



आंवला 👉 इस पेड़ की पूजा से देवी लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और पूजा करने वाले को धन संबंधी कोई समस्या नहीं होती। उसे हर क्षेत्र में सफलता मिलती है।



बिल्व 👉 इस पेड़ के पत्ते व फल भगवान शिव को अर्पित किए जाते हैं। इसकी पूजा से नौकरी में प्रमोशन के योग बनते हैं व अकाल मृत्यु से रक्षा होती हैं।



अशोक 👉 इस की पूजा से सभी प्रकार के रोग-शोक दूर होते हैं व पारिवारिक जीवन सुखी होता है। किसी विशेष कामना पूर्ति के लिए भी इसकी पूजा की जाती है।



केला 👉 जिन लोगों की कुंडली में गुरु संबंधित दोष होते हैं, वे यदि इस पेड़ की पूजा करें तो उन्हें लाभ होता है। इसकी पूजा से विवाह के योग भी शीघ्र बनते हैं।



शमी 👉 इस पेड़ की पूजा से शत्रुओं पर विजय मिलती हैं व कोर्ट केस में सफलता मिलने के योग बनते हैं। दशहरे पर इसकी विशेष पूजा की जाती है।



लाल चन्दन 👉 सूर्य से संबंधित गृह दोष दूर करने के लिए लाल चंदन के पेड़ की पूजा विधि-विधान से करनी चाहिए। इससे प्रमोशन होने के योग भी बनते हैं।



- वैदिक संस्कृति

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गणेश जी को दुर्वा और मोदक चढाने का महत्व क्यों है..?

 गणेश जी को दुर्वा और मोदक चढाने का महत्व क्यों है ..??


गणेश जी को दूर्वा ओर मोदक चढ़ाने का महत्व..??



भगवान् गणेशजी की 3 या 5 गांठ वाली दूर्वा

 (एक प्रकार की घास) अर्पण करने से वह प्रसन्न होते हैं और भक्तों को मनोवांछित फल प्रदान करते हैं।

 इसीलिए उन्हें दूर्वा चढ़ाने का शास्त्रों में महत्त्व बताया गया है। इसके संबंध में पुराण में एक कथा का उल्लेख मिलता है-

 "एक समय पृथ्वी पर अनलासुर नामक राक्षस ने भयंकर उत्पात मचा रखा था। उसका अत्याचार पृथ्वी के साथ-साथ स्वर्ग और पाताल तक फैलने लगा था। वह भगवद् भक्ति व ईश्वर आराधना करने वाले ऋषि-मुनियों और निर्दोष लोगों को जिंदा निगल जाता था। देवराज इंद्र ने उससे कई बार युद्ध किया, लेकिन उन्हें हमेशा परास्त होना पड़ा। अनलासुर से त्रस्त होकर समस्त देवता भगवान् शिव के पास गए। उन्होंने बताया कि उसे सिर्फ गणेश ही खत्म कर सकते हैं, क्योंकि उनका पेट बड़ा है इसलिए वे उसको पूरा निगल लेंगे। इस पर देवताओं ने गणेश की स्तुति कर उन्हें प्रसन्न किया। गणेशजी ने अनलासुर का पीछा किया और उसे निगल गए। इससे उनके पेट में काफी जलन होने लगी। अनेक उपाय किए गए, लेकिन ज्वाला शांत न हुई। जब कश्यप ऋषि को यह बात मालूम हुई, तो वे तुरंत कैलास गए और 21 दूर्वा एकत्रित कर एक गांठ तैयार कर गणेश को खिलाई, जिससे उनके पेट की ज्वाला तुरंत शांत हो गई।


गणेशजी को मोदक यानी लड्डू काफी प्रिय हैं। इनके बिना गणेशजी की पूजा अधूरी ही मानी जाती है। 

गोस्वामी तुलसीदास ने विनय पत्रिका में कहा है-
गाइए गनपति जगबंदन । संकर सुवन भवानी नंदन।
सिद्धि-सदन गज बदन विनायक।कृपा-सिंधु सुंदर सब लायक ॥

मोदकप्रिय मुद मंगलदाता। विद्या वारिधि बुद्धि विधाता ॥


इसमें भी उनकी मोदकप्रियता प्रदर्शित होती है। महाराष्ट्र के भक्त आमतौर पर गणेशजी को मोदक चढ़ाते हैं। उल्लेखनीय है कि मोदक मैदे के खोल में रखा, चीनी, मावे का मिश्रण कर बनाए जाते हैं। जबकि लड्डू मावे व मोतीचूर के बनाए हुए भी उन्हें पसंद हैं। जो भक्त पूर्ण श्रद्धाभाव से गणेशजी को मोदक या लड्डुओं का भोग लगाते हैं, उन पर वे शीघ्र प्रसन्न होकर इच्छापूर्ति करते हैं।


मोद यानी आनंद और 'क' का शाब्दिक अर्थ छोटा-सा भाग मानकर ही मोदक शब्द बना है, जिसका तात्पर्य हाथ में रखने मात्र से आनंद की अनुभूति होना है। ऐसे प्रसाद को जब गणेशजी को चढ़ाया जाए, तो सुख की अनुभूति होना स्वाभाविक है। एक दूसरी व्याख्या के अनुसार जैसे ज्ञान का प्रतीक मोदक मीठा होता है, वैसे ही ज्ञान का प्रसाद भी मीठा होता है।


गणपति अथर्वशीर्ष में लिखा है-
यो दूर्वाकुरैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति।
यो लाजैर्यजति स यशोवान भवति स मेघावान भवति ॥
यो मोदक सहस्रेण यजति स वांछित फलमवाप्राप्नोति ॥


अर्थात् जो भगवान् को दूर्वा चढ़ाता है, वह कुबेर के समान हो जाता है। जो लाजो (धान-लाई) चढ़ाता है, वह यशस्वी हो जाता है, मेधावी हो जाता है और जो एक हजार लड्डुओं का भोग गणेश भगवान् को लगाता है, वह वांछित फल प्राप्त करता है।


गणेशजी को गुड़ भी प्रिय है। उनकी मोदकप्रियता के संबंध में एक कथा पद्द्मपुराण में आती है। एक बार गजानन और कार्तिकेय के दर्शन करके देवगण अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने माता पार्वती को एक दिव्य लड्डू प्रदान किया। इस लड्डू को दोनों बालक आग्रह कर मांगने लगे। तब माता पार्वती ने लड्डू के गुण बताए "इस मोदक की गंध से ही अमरत्व की प्राप्ति होती है। निस्संदेह इसे सूंघने या खाने वाला संपूर्ण शास्त्रों का मर्मज्ञ, सब तंत्रों में प्रवीण, लेखक, चित्रकार, विद्वान, ज्ञान-विज्ञान विशारद और सर्वज्ञ हो जाता है।" फिर आगे कहा- "तुम दोनों में से जो धर्माचरण के द्वारा अपनी श्रेष्ठता पहले सिद्ध करेगा, वही इस दिव्य मोदक को पाने का अधिकारी होगा।"


माता पार्वती की आज्ञा पाकर कार्तिकेय अपने तीव्रगामी वाहन मयूर पर आरूढ़ होकर त्रिलोक की तीर्थयात्रा पर चल पड़े और मुहूर्त भर में ही सभी तीर्थों के दर्शन, स्नान कर लिए। इधर गणेशजी ने अत्यंत श्रद्धा-भक्ति पूर्वक माता-पिता की परिक्रमा की और हाथ जोड़कर उनके सम्मुख खड़े हो गए और कहा कि तीर्थ स्थान, देव स्थान के दर्शन, अनुष्ठान व सभी प्रकार के व्रत करने से भी माता-पिता के पूजन के सोलहवें अंश के बराबर पुण्य प्राप्त नहीं होता है, अतः मोदक प्राप्त करने का अधिकारी मैं हूं। गणेशजी का तर्कपूर्ण जवाब सुनकर माता पार्वती ने प्रसन्न होकर गणेशजी को मोदक प्रदान कर दिया और कहा कि माता-पिता की भक्ति के कारण गणेश ही यज्ञादि सभी शुभ कार्यों में सर्वत्र अग्रपूज्य होंगे।



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आज का पंचांग - आज 30 जनवरी 2025 , गुरुवार ।। वैदिक पंचांग ।। हिन्दू पंचांग कैलेंडर 2025

आज का पंचांग - आज 30 जनवरी 2025 , गुरुवार ।। वैदिक पंचांग ।। हिन्दू पंचांग कैलेंडर 2025


आज का पंचांग


📜आज का वैदिक पंचांग 📜
⛅दिनांक - 30 जनवरी 2025
⛅दिन - गुरुवार
⛅विक्रम संवत् - 2081
⛅अयन - उत्तरायण
⛅ऋतु - शिशिर
⛅मास - माघ
⛅पक्ष - कृष्ण
⛅तिथि - प्रतिपदा शाम 04:10 तक तत्पश्चात द्वितीया
⛅नक्षत्र - श्रवण प्रातः 07:15 तक तत्पश्चात धनिष्ठा प्रातः 05:50 जनवरी 31 तक, तत्पश्चात शतभिषा
⛅योग - व्यतीपात शाम 06:33 तक, तत्पश्चात वरियान
⛅राहु काल - दोपहर 02:16 से दोपहर 03:40 तक
⛅सूर्योदय - 07:24
⛅सूर्यास्त - 06:21
⛅दिशा शूल - दक्षिण दिशा में
⛅ब्राह्ममुहूर्त - प्रातः 05:37 से 06:28 तक
⛅अभिजीत मुहूर्त - दोपहर 12:31 से दोपहर 01:15 तक
⛅निशिता मुहूर्त - रात्रि 12:27 जनवरी 31 से रात्रि 01:19 जनवरी 31 तक


⛅व्रत पर्व विवरण - गाँधीजी पुण्यतिथि, माघी गुप्त नवरात्रि आरम्भ, व्यतीपात योग (सूर्योदय से शाम 06:33 तक)


⛅विशेष - प्रतिपदा को कुष्माण्ड (कुम्हड़ा, पेठा) न खाएं क्योंकि यह धन का नाश करने वाला है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)



🔹सबके लिए क्यों जरूरी है सूर्यस्नान ?🔹


🔸सूर्य की किरणों में जो रोगप्रतिकारक शक्ति है, रोगनाशिनी शक्ति है वह दुनिया की सब औषधियों को मिलाकर भी नहीं मिलती है ।


🔸  डॉक्टर सोले कहते हैं : "सूर्य में जितनी रोगनाशक शक्ति है उतनी संसार के अन्य किसी पदार्थ में नहीं है ।


🔸 कैंसर, नासूर, भगंदर आदि दुःसाध्य रोग, जो बिजली या रेडियम के प्रयोग से भी ठीक नहीं किये जा सकते, वे सूर्य-रश्मियों के प्रयोग से ठीक होते हुए मैंने देखे हैं ।"


🔸जो माइयाँ सूर्यकिरणों से अपने को बचाये रखती हैं उनके जीवन में ज्यादा बीमारियाँ देखी जा सकती हैं । इसलिए रोज सुबह सिर को कपड़े से ढककर ८ मिनट सूर्य की ओर मुख व १० मिनट पीठ करके बैठना चाहिए । ऐसा सूर्यस्नान लेटकर करें तो और अच्छा ।


🔸डॉक्टर होनर्ग ने लिखा है: 'रक्त का पीलापन, पतलापन, लोह (हीमोग्लोबिन) की कमी, नसों की दुर्बलता, कमजोरी, थकान, पेशियों की शिथिलता आदि बीमारियों का सूर्य किरण की मदद से इलाज करना लाजवाब है ।'


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बुधवार, 29 जनवरी 2025

Mahakumbh News: प्रयागराज महाकुंभ में आधी रात को क्या हुआ, क्यों मची गयी भगदड़, औऱ अब कैसे हालात..??

Mahakumbh News: प्रयागराज महाकुंभ में आधी रात को क्या हुआ, क्यों मची गयी भगदड़, औऱ अब कैसे हालात? आइये जानते है संगम नगरी का पूरा हाल - वैदिक संस्कृति



Mahakumbh


Mahakumbh Mela News: महाकुंभ मेले में मौनी अमावस्या पर अमृत स्नान करने के लिए श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ा है. संगम नगरी में करीब 8-10 करोड़ लोग मौजूद हैं. आम आदमी का स्नान जारी है. भीड़ कम होने के बाद अखाड़ों का अमृत स्नान शुरू होगा. महाकुंभ मेले में बुधवार अचानक से भगदड़ मच गई थी. मौनी अमावस्या पर स्नान करने को श्रद्धालु इस कदर बेताब थे कि वे बैरिकेट फांदने लगे. इसकी वजह से अफरा-तफरी मच गई. इस भगदड़ में कई लोग घायल हो गए. सबका इलाज अस्पताल में चल रहा है. कुछ लोगों के मरने की भी आशंका है. फिलहाल, सीएम योगी से लेकर पीएम मोदी तक की महाकुंभ मेले पर नजर है. भगदड़ पर आस्था भारी पड़ती दिख रही है ।


प्रयागराज के संगम तट पर मंगलवार-बुधवार की रात करीब डेढ़ बजे भगदड़ मच गई। हादसे में अब तक 20 से ज्यादा लोगों की मौत होने की खबर है। वैदिक संस्कृति की रिपोर्ट के मुताबिक 50 से ज्यादा श्रद्धालु घायल हैं। मेडिकल कॉलेज में पहले 14 शव पोस्टमॉर्टम के लिए लाए गए। बाद में एंबुलेंस से कुछ और शवों को मेला क्षेत्र से लाया गया।

इधर, प्रशासन ने मौत या घायलों की संख्या को लेकर हादसे के 13 घंटे बाद भी कोई जानकारी नहीं दी है। पीएम मोदी ने मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना जताई है। सीएम योगी आदित्यनाथ ने लोगों से संयम बरतने की अपील की है। उन्होंने कहा-श्रद्धालु संगम पर ही स्नान करने की न सोचें। गंगा हर जगह पवित्र है, वे जहां हैं उसी तट पर स्नान करें।


महाकुम्भ-2025, प्रयागराज आए प्रिय श्रद्धालुओं, माँ गंगा के जिस घाट के आप समीप हैं, वहीं स्नान करें, संगम नोज की ओर जाने का प्रयास न करें। आप सभी प्रशासन के निर्देशों का अनुपालन करें, व्यवस्था बनाने में सहयोग करें। संगम के सभी घाटों पर शांतिपूर्वक स्नान हो रहा है। किसी भी अफवाह पर बिल्कुल भी ध्यान न दें।


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मैं उत्तर प्रदेश सरकार के साथ निरंतर संपर्क में हूं। करोड़ों श्रद्धालु आज वहां पहुंचे हैं, कुछ समय के लिए स्नान की प्रक्रिया में रुकावट आई थी, लेकिन अब कई घंटों से सुचारू रूप से लोग स्नान कर रहे हैं। -पीएम मोदी, दिल्ली की चुनावी सभा में

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उधर, कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि वीआईपी कल्चर और सरकार की बदइंतजामी के कारण भगदड़ मची है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा- महाकुंभ को सेना के हवाले कर देना चाहिए।

भगदड़ की 2 प्रमुख वजहें

  • अमृत स्नान की वजह से ज्यादातर पांटून पुल बंद थे। इसके कारण संगम पर पहुंचने वाली करोड़ों की भीड़ इकट्ठा होती चली गई। जिससे बैरिकेड्स में फंसकर कुछ लोग गिर गए। यह देखकर भगदड़ की अफवाह फैल गई।
  • संगम नोज पर एंट्री और एग्जिट के रास्ते अलग-अलग नहीं थे। लोग जिस रास्ते से आ रहे थे, उसी रास्ते से वापस जा रहे थे। ऐसे में जब भगदड़ मची तो लोगों को भागने का मौका नहीं मिला। वे एक-दूसरे के ऊपर गिरते गए।

हादसे के बाद 70 से ज्यादा एम्बुलेंस संगम तट पर पहुंचीं। इनसे घायलों और मृतकों को अस्पताल ले जाया गया। हादसे के बाद संगम तट पर NSG कमांडो ने मोर्चा संभाल लिया। संगम नोज इलाके में आम लोगों की एंट्री बंद कर दी गई। भीड़ और न बढ़े, इसलिए प्रयागराज से सटे जिलों में श्रद्धालुओं को रोक दिया गया है। वहां प्रशासन को अलर्ट कर दिया गया है।

महाकुंभ में आज मौनी अमावस्या का स्नान है, जिसके चलते करीब 9 करोड़ श्रद्धालुओं के शहर में मौजूद होने का अनुमान है। प्रशासन के मुताबिक, संगम समेत 44 घाटों पर आज देर रात तक 8 से 10 करोड़ श्रद्धालुओं के डुबकी लगाने का अनुमान है।

इससे एक दिन पहले यानी मंगलवार को साढ़े 5 करोड़ से ज्यादा श्रद्धालुओं ने संगम में डुबकी लगाई। पूरे शहर में सुरक्षा के लिए 60 हजार से ज्यादा जवान तैनात हैं।


- वैदिक संस्कृति

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